
उत्तराखंड के स्कूलों में गीता पाठ शुरू, शिक्षकों के एक वर्ग ने जताई आपत्ति..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में शिक्षा से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है। सीएम पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के बाद राज्य के सरकारी और निजी स्कूलों में अब भगवद गीता के श्लोकों के साथ दिन की शुरुआत की जा रही है। इस फैसले को जहाँ कुछ लोग सांस्कृतिक जागरूकता के तौर पर देख रहे हैं, वहीं शिक्षकों के एक वर्ग ने इस पर सख्त आपत्ति जताई है। सीएम धामी ने पिछले सप्ताह निर्देश जारी करते हुए कहा था कि उत्तराखंड के छात्र केवल पढ़ाई में ही नहीं, नैतिक मूल्यों में भी श्रेष्ठ हों इसके लिए गीता जैसे ग्रंथों का पाठ जरूरी है। इसके तहत सुबह की प्रार्थना सभा में गीता श्लोकों का उच्चारण अनिवार्य कर दिया गया है। यह निर्णय सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों पर प्रभावी है। राज्य के विभिन्न जिलों से संबंधित शिक्षकों के संगठनों और स्वतंत्र शिक्षकों ने शिक्षा विभाग को एक संयुक्त पत्र सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि विद्यालय संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष स्थान होते हैं। एक विशेष धर्मग्रंथ को अनिवार्य करना सभी छात्रों की धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों का उल्लंघन है।
उत्तराखंड के कई स्कूलों के शिक्षकों ने इस पर विरोध जताते हुए निदेशक को एक लिखित अनुरोध पत्र सौंपा है, जिसमें इस कदम को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया गया है। विशेष रूप से एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन ने सामने आकर सरकार के फैसले का विरोध किया है और कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों में किसी एक धर्म की शिक्षा लागू करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विपरीत है। एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष संजय टम्टा ने बयान जारी करते हुए कहा कि संविधान में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा। शिक्षा के नाम पर किसी खास धार्मिक ग्रंथ को पढ़ाना अन्य समुदायों के अधिकारों का हनन है। हम बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के पक्ष में हैं, लेकिन किसी एक धर्म की पुस्तक को अनिवार्य रूप से पढ़ाना सर्वमान्य नहीं है।