
लोहाघाट में इको टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा, वन विभाग बनाएगा छह कॉटेज..
पर्यटकों के लिए तैयार हो रही ठहरने की सुविधा..
उत्तराखंड: उत्तराखंड के चंपावत जिले के प्रसिद्ध लोहाघाट क्षेत्र में अब इको टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा देने की तैयारी शुरू हो गई है। वन विभाग ने लोहाघाट को पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से स्थापित करने के लिए अहम कदम उठाया है। इसके तहत क्षेत्र में पर्यटकों के ठहरने की सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे यहां आने वाले सैलानियों को बेहतर अनुभव मिल सके। विशेष रूप से हिम दर्शन के लिए प्रसिद्ध नलिया क्षेत्र में कॉटेज बनाए जाएंगे, जहां पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए रुक सकेंगे। योजना के तहत इन कुटीरों में स्थानीय स्थापत्य और पारंपरिक शैली को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे क्षेत्रीय पहचान को भी बढ़ावा मिल सके। लोहाघाट की खूबसूरती और सांस्कृतिक महत्व पहले से ही पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है। इसके आसपास बालेश्वर मंदिर, मायावती आश्रम, हिंगला देवी मंदिर, और करीब ढाई घंटे की दूरी पर वाराही देवी मंदिर स्थित हैं। वहीं कोलीढेक झील और वाणासुर का किला जैसी ऐतिहासिक और प्राकृतिक जगहें भी लोहाघाट के आकर्षण को और बढ़ाती हैं। वन विभाग का यह प्रयास न सिर्फ स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर भी प्रदान करेगा। इससे लोहाघाट को एक सस्टेनेबल टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
उत्तराखंड के देवदार वृक्षों से आच्छादित लोहाघाट क्षेत्र में वन विभाग ने इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए गंभीर पहल शुरू कर दी है। क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण को देखते हुए, वन विभाग ने लोहाघाट में स्थित अपनी पुरानी वन अनुसंधान नर्सरी और भवनों को अब चंपावत वन प्रभाग को वापस सौंप दिया है, ताकि उन्हें इको टूरिज्म गतिविधियों के लिए विकसित किया जा सके। प्रभागीय वनाधिकारी नवीन पंत के अनुसार इन पुराने भवनों का सुदृढ़ीकरण और सौंदर्यीकरण किया जाएगा। इसके साथ ही उन्हें पर्यटकों के ठहरने योग्य सुविधाओं से सुसज्जित किया जाएगा। योजना के तहत यहां एक बार में लगभग 10 परिवारों के ठहरने की व्यवस्था की जा सकेगी। लोहाघाट क्षेत्र की खास बात यह है कि यह न केवल हरियाली से भरपूर है, बल्कि यह हिमालय दर्शन के लिए भी एक प्रमुख स्थान है। खासकर लोहाघाट-वाराही देवी मंदिर मार्ग पर स्थित नलिया जगह से बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है, जो पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। इसके साथ ही क्षेत्र में बालेश्वर मंदिर, मायावती आश्रम, हिंगला देवी, कोलीढेक झील, और वाणासुर का किला जैसे धार्मिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थल भी हैं, जो लोहाघाट को एक पर्यटन की संपूर्ण पैकेज डेस्टिनेशन बनाते हैं। वन विभाग की यह पहल न केवल पर्यटन विकास बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के नए रास्ते खोलने का काम भी करेगी। लक्ष्य है कि लोहाघाट को एक सस्टेनेबल और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
वन विभाग ने लोहाघाट में पूर्व में स्थित वन अनुसंधान नर्सरी और वन चेतना केंद्र के भवन को उपयोग में लाने की योजना शुरू कर दी है। पहले यह भवन जर्जर स्थिति में था, जिसे अब सुधारकर पर्यटकों के ठहरने योग्य सुविधाओं में बदला जा रहा है। इसके साथ ही विभाग ने छह कॉटेज बनाने की योजना तैयार की है, जिनके लिए स्थान का चयन कर लिया गया है। इन कॉटेजों का निर्माण पारंपरिक शैली और प्राकृतिक परिवेश के अनुरूप किया जाएगा ताकि पर्यटक प्रकृति के करीब रहकर हिमालयी सौंदर्य का अनुभव ले सकें। वन विभाग ने कहा कि अन्य स्थानों पर भी इको टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्रोजेक्ट तैयार कर वन मुख्यालय को भेजे गए हैं। इससे क्षेत्र में इको टूरिज्म की नई संभावनाएं खुलेंगी और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे। वन विभाग की यह पहल न सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि इसे सस्टेनेबल टूरिज्म मॉडल के रूप में भी विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।