June 22, 2026
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उत्तराखंड में बढ़ी बिजली की मांग, कटौती और महंगी खरीद से बढ़ा ऊर्जा विभाग पर दबाव..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही बिजली की मांग ऊर्जा विभाग के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। जून महीने में प्रदेश की विद्युत खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जबकि राज्य की अपनी उत्पादन क्षमता मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाई है। स्थिति यह है कि बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा निगमों को खुले बाजार से महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही है। इसके साथ ही बिजली प्रबंधन को संतुलित रखने के लिए कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में आपूर्ति पर सीमित नियंत्रण जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में औद्योगिक विकास, शहरी विस्तार और जनसंख्या वृद्धि ने ऊर्जा खपत को लगातार बढ़ाया है। घरेलू उपभोक्ताओं से लेकर व्यापारिक प्रतिष्ठानों और उद्योगों तक, हर क्षेत्र में बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है। हालांकि सरकार ने पिछले वर्षों में नई जलविद्युत परियोजनाओं, सौर ऊर्जा संयंत्रों और ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन बढ़ती मांग के मुकाबले ये प्रयास अभी पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं।

वर्तमान स्थिति की बात करें तो प्रदेश में प्रतिदिन बिजली की मांग लगभग 6.1 करोड़ यूनिट तक पहुंच चुकी है। इसके मुकाबले राज्य की अपनी उत्पादन क्षमता करीब 1.8 करोड़ यूनिट प्रतिदिन ही है। इसका अर्थ यह है कि उत्तराखंड अपनी कुल जरूरत का आधा भी बिजली उत्पादन स्वयं नहीं कर पा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार यह अंतर आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है यदि उत्पादन क्षमता में बड़े स्तर पर वृद्धि नहीं की गई। प्रदेश को राहत केंद्रीय पूल से मिलने वाली बिजली से मिल रही है। वर्तमान में उत्तराखंड को केंद्रीय स्रोतों से लगभग 2 करोड़ यूनिट बिजली प्रतिदिन उपलब्ध हो रही है। राज्य के अपने उत्पादन और केंद्रीय आवंटन को मिलाकर कुल उपलब्धता करीब 3.8 करोड़ यूनिट प्रतिदिन तक पहुंचती है। इसके बावजूद मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। इस कमी को पूरा करने के लिए उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) को बिजली एक्सचेंज और अन्य बाहरी स्रोतों से अतिरिक्त बिजली खरीदनी पड़ रही है।

बिजली की यह खरीद राज्य के लिए आर्थिक रूप से भी भारी साबित हो रही है। खुले बाजार में बिजली की कीमतें कई बार सामान्य दरों की तुलना में अधिक होती हैं, जिससे ऊर्जा निगमों पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है। बढ़ती मांग के कारण यूपीसीएल को लगातार अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था करनी पड़ रही है ताकि घरेलू उपभोक्ताओं और आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति प्रभावित न हो।

ऊर्जा मांग के दबाव को देखते हुए विभाग ने बिजली प्रबंधन के लिए कुछ अस्थायी कदम भी उठाए हैं। इसी क्रम में स्टील फर्नेस जैसे ऊर्जा-गहन उद्योगों की बिजली आपूर्ति में सीमित अवधि के लिए कटौती का निर्णय लिया गया है। विभाग का कहना है कि यह कदम केवल मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उठाया गया है तथा आम उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जा रहा है। बिजली खरीद पर होने वाला खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। चालू वित्तीय वर्ष में प्रदेश को बिजली खरीद पर लगभग 9,407 करोड़ रुपये खर्च करने का अनुमान है। यह आंकड़ा पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में अधिक है, जब बिजली खरीद पर करीब 9,170 करोड़ रुपये व्यय किए गए थे। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले वर्षों में यह आर्थिक बोझ और अधिक बढ़ सकता है।

राज्य सरकार और ऊर्जा विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम करने का दावा कर रहे हैं। जलविद्युत परियोजनाओं को गति देने, सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने, निजी निवेश को आकर्षित करने और बिजली चोरी रोकने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। विभाग का कहना है कि वितरण हानियों को कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने से भविष्य में स्थिति में सुधार आ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ने, नए औद्योगिक निवेश आने, पर्यटन गतिविधियों के विस्तार और घरेलू उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण बिजली की मांग और तेजी से बढ़ेगी। ऐसे में केवल बाजार से बिजली खरीदना दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जा सकता। इसके लिए राज्य को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने, ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड के पास जलविद्युत और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि इन संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया जाए तो प्रदेश न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है बल्कि भविष्य में ऊर्जा अधिशेष राज्य बनने की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है। फिलहाल बढ़ती मांग और सीमित उत्पादन क्षमता के बीच संतुलन बनाना ऊर्जा विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

 

 

 

 

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