गंगा की सफाई में नई पहल, ऋषिकेश में जापानी पोर्टेबल एसटीपी ‘जोकासू’ लगाया जाएगा..
उत्तराखंड: गंगा नदी को प्रदूषण से बचाने और जल को स्वच्छ बनाए रखने के लिए उत्तराखंड में अब जापानी तकनीक ‘जोकासू’ (Joukasu) का प्रयोग किया जा रहा है। राज्य में इस तकनीक का पहला मॉडल प्रोजेक्ट ऋषिकेश के ढालवाला क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा। केंद्र सरकार ने इसके लिए मंजूरी दे दी है, जबकि वन विभाग से एनओसी की प्रक्रिया भी गतिमान है। ऋषिकेश में वर्तमान में सीवरेज सिस्टम पूरी तरह व्यवस्थित नहीं होने के कारण, अनियोजित कालोनियों और बस्तियों का गंदा पानी सहायक नदियों के जरिए सीधे गंगा में बह रहा है। समस्या केवल तीर्थनगरी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में भी सीवरेज व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह समस्या यथावत बनी रही, तो भूजल प्रदूषण की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
इस संकट को देखते हुए प्रदेश सरकार ने जापान की ‘जोकासू तकनीक’ को लागू करने का निर्णय लिया है। ढालवाला में इस प्रोजेक्ट के लिए जल निगम को जिम्मेदारी सौंपी गई है। कुल लागत लगभग 4 करोड़ रुपये अनुमानित है और इसके लिए 1,000 वर्ग गज भूमि चिन्हित की गई है। जल निगम अधिकारियों के मुताबिक, यह तकनीक खासकर अनियोजित बस्तियों और कालोनियों के सीवरेज के लिए उपयुक्त है और पोर्टेबल एसटीपी के रूप में काम करेगी। इस परियोजना के तहत गंदा पानी शुद्ध कर चंद्रभागा नदी में छोड़ा जाएगा, जिससे आगे चलकर स्वच्छ जल गंगा में पहुंच सकेगा।
नमामि गंगे परियोजना के प्रोजेक्ट मैनेजर एसके वर्मा ने कहा कि ढालवाला में स्थापित होने वाले जोकासू प्रोजेक्ट की शोधन क्षमता 300 किलोलीटर प्रतिदिन (KLD) होगी। इसके संचालन और रखरखाव के लिए जापान से विशेषज्ञ इंजीनियर भी आएंगे। योजना यह है कि यदि यह प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो पूरे उत्तराखंड में ऐसे किफायती और छोटे पोर्टेबल एसटीपी लगाए जाएंगे। इसके अलावा तीर्थनगरी में गंगा किनारे स्थित आश्रमों और होटलों के लिए भी इस तकनीक से जोड़ने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के सफल क्रियान्वयन से न केवल गंगा और उसकी सहायक नदियों की शुद्धता सुनिश्चित होगी, बल्कि प्रदेश के अनियोजित बस्तियों में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक नया अध्याय शुरू होगा।
