July 11, 2026
landslide

बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर फिर भूस्खलन, सिरोबगड़ में मलबा गिरने से यातायात बाधित

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में लगातार हो रही बारिश ने एक बार फिर चारधाम यात्रा और आम जनजीवन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सड़कों में शामिल ऋषिकेश–बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच स्थित सिरोबगड़–खांकरा भूस्खलन क्षेत्र में भारी मलबा और चट्टानें गिरने से मार्ग पूरी तरह बाधित हो गया है। शुक्रवार देर रात से बंद पड़ा हाईवे शनिवार तक भी यातायात के लिए नहीं खोला जा सका, जिससे हजारों यात्री और स्थानीय लोग रास्ते में फंस गए। लगातार बारिश के कारण पहाड़ी से मलबा और विशाल बोल्डर गिरने का सिलसिला जारी है। ऐसे में राष्ट्रीय राजमार्ग को खोलने के लिए तैनात मशीनों और कर्मचारियों को भी भारी जोखिम के बीच काम करना पड़ रहा है। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए ही मार्ग को यातायात के लिए खोला जाएगा।

30 वर्षों से बना हुआ है सबसे संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्र

सिरोबगड़ लैंडस्लाइड जोन लंबे समय से उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्रों में गिना जाता है। लगभग तीन दशक से यह इलाका हर मानसून में भारी नुकसान का कारण बनता रहा है। बरसात शुरू होते ही यहां बार-बार पहाड़ दरकते हैं, जिससे बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग कई-कई घंटे या कई बार दिनों तक बंद रहता है। चारधाम यात्रा के दौरान इस मार्ग का महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि बद्रीनाथ धाम जाने वाले श्रद्धालुओं का मुख्य आवागमन इसी सड़क से होता है। इसके बावजूद अब तक इस भूस्खलन क्षेत्र का स्थायी और वैज्ञानिक समाधान नहीं निकल पाया है। हाईवे बंद होने के बाद सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से कई स्थानों पर यातायात रोक दिया, जिससे करीब 10 किलोमीटर तक जाम की स्थिति बन गई। जाम में तीर्थयात्रियों के अलावा स्थानीय निवासी, पर्यटक और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने वाले वाहन भी फंस गए। कई यात्रियों को पूरी रात अपने वाहनों में ही बितानी पड़ी। लगातार बारिश, ठंड और अनिश्चितता के कारण छोटे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ा। यातायात व्यवस्था को पूरी तरह ठप होने से बचाने के लिए प्रशासन ने छोटे वाहनों को वैकल्पिक छांतीखाल मोटर मार्ग से श्रीनगर की ओर भेजना शुरू कर दिया है। हालांकि भारी वाहन अब भी राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही रुके हुए हैं और उनके लिए मार्ग खुलने का इंतजार किया जा रहा है।

मलबा हटाने का काम लगातार जारी

यातायात पुलिस और संबंधित एजेंसियां जेसीबी और अन्य मशीनों की मदद से लगातार मलबा हटाने में जुटी हुई हैं। लेकिन ऊपर से लगातार गिर रहे पत्थरों और बोल्डरों के कारण राहत कार्य बार-बार बाधित हो रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जब तक पहाड़ी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाती, तब तक वाहनों की आवाजाही शुरू करना जोखिम भरा होगा। इसलिए सड़क खोलने में जल्दबाजी नहीं की जाएगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि सिरोबगड़ की समस्या कोई नई नहीं है। पिछले कई वर्षों से हर मानसून में यही स्थिति बनती है। सड़क बंद होने से चारधाम यात्रा प्रभावित होती है, स्थानीय कारोबार पर असर पड़ता है और आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। क्षेत्र के सामाजिक प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की है कि इस लैंडस्लाइड जोन का वैज्ञानिक अध्ययन कर स्थायी उपचार कराया जाए, ताकि हर वर्ष दोहराई जाने वाली इस समस्या से हमेशा के लिए राहत मिल सके।

15 जुलाई तक बारिश का दौर जारी रहने के आसार

इस बीच मौसम विभाग ने भी अगले कुछ दिनों के लिए राज्य में बारिश का सिलसिला जारी रहने की संभावना जताई है। विभाग के अनुसार 15 जुलाई तक उत्तराखंड के अधिकांश हिस्सों में हल्की से मध्यम बारिश के साथ कई स्थानों पर भारी वर्षा हो सकती है। पूर्वानुमान के अनुसार देहरादून, पिथौरागढ़, चंपावत, नैनीताल, बागेश्वर और ऊधमसिंह नगर सहित कई जिलों में भारी बारिश की संभावना है। पर्वतीय क्षेत्रों में गरज-चमक के साथ तेज बारिश के दौर भी देखने को मिल सकते हैं। 12 और 13 जुलाई को भी चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और आसपास के पर्वतीय जिलों में भारी वर्षा की चेतावनी जारी की गई है। वहीं 14 और 15 जुलाई को राज्य के अधिकांश जिलों में व्यापक स्तर पर बारिश होने के आसार हैं। लगातार खराब मौसम और भूस्खलन की घटनाओं को देखते हुए प्रशासन ने चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं और अन्य यात्रियों से मौसम की ताजा जानकारी लेने के बाद ही यात्रा शुरू करने की अपील की है। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में अनावश्यक रुकने से बचने और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने को कहा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सिरोबगड़ जैसे संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्रों का समय रहते स्थायी समाधान नहीं किया गया तो हर मानसून में चारधाम यात्रा, स्थानीय यातायात और आर्थिक गतिविधियों पर इसी तरह असर पड़ता रहेगा।

 

 

 

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